महात्मा गांधी से अज्ञात शिक्षायें | Unknown Lessons from the Mahatma

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गांधी जयंती वह अवसर है, जब हमें देखना है कि हम गांधीजी से क्या सीख सकते है। प्रत्येक व्यक्ति का जीवन हमें शिक्षा देता है कि हमें क्या करना चाहिए और क्या नहीं करना चाहिए। त्यागभाव, सब को स्वीकार करना, सत्संग के प्रति अटूट विश्वास, देश को ऊंचा उठाने का लक्ष्य तथा समाज कल्याण जैसे गांधी जी के आदर्श कई पीढ़ियों के लिए प्रेरणादायक रहे हैं। परन्तु उनके जीवन के ऐसे पहलू भी थे, जो कि हमें यह शिक्षा देते हैं कि हमें क्या नहीं करना चाहिए।

मेरे शिक्षक पंडित सुधाकर चतुर्वेदी जो कि ११८ वर्ष की आयु में अभी भी जीवित हैं, गांधी जी के साथ काफी लंबे समय तक रहे है। बैंगलोर निवासी होने के कारण गांधी जी उनको बैंगलोरी कहते थे, वह गांधी जी को भगवद् गीता की शिक्षा भी देते थे। जिस दिन कस्तूरबा का निधन हुआ वे दोनों यरवदा जेल में साथ थे। उनको मृत्यु शैया पर देख गांधीजी ने कहा,”बैंगलोरी! तुम्हारे बापू की आज अग्नि परीक्षा है”। पंडित जी ने पहली बार बापू की आंखों में आंसू देखे। जैसे ही गांधी जी ने कस्तूरबा को गीता का दूसरा अध्याय पढ़ कर सुनाया, उन्होंने अंतिम श्वास ली। गांधी जी बोले,” मुझे एहसास होता है कि मैंने इनको बहुत दुख दिए हैं और कोई खुशी नहीं दी”। कस्तूरबा ने उनके मिशन में आखिरी समय तक साथ दिया। यदि वह कभी-कभी कस्तूरबा की कुछ इच्छाओं का सम्मान करते हुए उन को पूरा कर देते तो इस समय उनको इतना पछतावा नहीं होता।

गांधी जी को उस समय गहन कष्ट हुआ, जब उनके पुत्र ने धर्म परिवर्तन कर लिया। उन्होंने धर्म परिवर्तन के विरोध में बहुत कुछ कहा और पछतावे से यह स्वीकार किया कि वह अपने बच्चों को सही मूल्यों की शिक्षा नहीं दे पाए और अपने धर्म का सम्मान करना नहीं सिखा सके। उन्हें राष्ट्रपिता संबोधन का सम्मान प्राप्त हुआ, परंतु वह अपने बेटों के अच्छे पिता न बन सके। पूरे देश की स्वतंत्रता की चाह रखने वाले, अपनी पत्नी को वही न दे सके। गांधीजी ने अपनी जिद के कारण अपने परिवार को बहुत दुख दिए तथा उनके स्वयं के बच्चे उनके विद्रोही बन गए। जीवन के सभी पक्षों को एक ही तराजू से तोलना सही नहीं है। विभिन्न परिस्थितियों व लोगों के साथ अलग-अलग मापदंड लेकर चलने की आवश्यकता होती है।

विभाजन के समय, गांधीजी के पास दंगों के समाचार आए, परंतु उन्होंने इस बात पर विश्वास नहीं किया कि वहां पर हिंसा हो रही है। इस मामले का आकलन करने के लिए उन्होंने बैंगलोरी को वहाँ भेजा, जहां उन पर सात बार चाकू से वार किया गया। एक अवसर पर तो उनको पकड़ कर गर्दन तक रेत के अंदर दबा दिया गया था। लोगों के मारने से पहले मुल्ला को, वहां पर आकर पहला पत्थर उनके ऊपर मारना था पर समय से सेना वहां पर पहुंच गई और वह बच गए। जब उन्होंने अपना अनुभव सुनाया तथा अपनी चोटें दिखाई तो गांधीजी ने उनके ऊपर आरोप लगाया कि, “तुम ये सब इसलिए कह रहे हो क्योंकि तुम खुद हिंदू हो, मेरे मुसलमान भाई ऐसा कभी नहीं कर सकते”। बैंगलोरी अपने ऊपर इस प्रकार संदेह किए जाने से हताश होकर गांधी जी को छोड़ कर चले गए। उसके तीन दिन बाद ही गांधी जी की हत्या हो गई। पंडितजी मुझे बताते थे कि, “मैं उस वृद्धआदमी को उनके जीवन के शेष तीन दिनों में छोड़ कर आ गया”- यह पीड़ा उन्हें सदैव रही।

मेरे दादाजी ने भी सेवा आश्रम में गांधी जी के साथ बारह वर्ष बिताए। वहां पर एक नियम था कि हर खाने की वस्तु के साथ सब को नीम की चटनी भी खानी पड़ती थी चाहे वह मीठी खीर ही क्यों न हो। एक तरफ तो यह तपस्या थी कि लोग अपने स्वाद के मोह से दूर हो सकें और यह अभ्यास सन्यासियों के लिए अच्छा था परंतु सबको ऐसा करने के लिए विवश करना गलत था। यहां तक कि बच्चों को भी इसका पालन करना पड़ता था।

गांधी जी अपने विचारों के प्रति काफी जिद्दी थे और उनके निर्णय को मानना सबके लिए अनिवार्य था। सब के विचारों को सुनना और सही तथा गलत का निर्णय परिस्थितियों के अनुसार करना, उनकी कार्यशैली में नहीं था। बहुत से अवसरों पर, वह बिना किसी तार्किक कारण के दूसरों पर दबाव बनाने के लिए और अपनी ही बात मनवाने के लिये व्रत करने लगते थे। जब यह मुद्दा उठा कि भारत का प्रथम प्रधानमंत्री किस को बनाया जाए, तो एक को छोड़कर कांग्रेस में सारे मत सरदार पटेल के पक्ष में गए। इस निष्कर्ष के बाद भी महात्मा गांधी ने प्रधान मंत्री के लिए जवाहरलाल नेहरु का नाम घोषित कर दिया। जिस व्यक्ति ने हमारे लोकतंत्र की नींव रखी, वही अपने जीवन में कई तरीकों में अलोकतांत्रिक था।

महात्मा गांधी ने पूरी दुनिया पर अपनी अमिट छाप छोड़ी है। वह उस समय अहिंसा के प्रति प्रतिबद्ध रहे जब विश्वयुद्ध हो रहे थे और उन्होंने अपना त्याग पूर्ण जीवन जीते हुए राष्ट्र की कमान संभाली। उनका जीवन एक से अधिक तरीकों से सबके लिए एक सबक रहेगा।

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