क्या भारतीय आध्यात्मिकता मदर टेरेसा की सहायता कर सकती थी? | Could Indian spirituality have helped Mother Teresa?

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मदर टेरेसा ने भारत के लिए अपूर्व सेवा कार्य किया है, क्या वह भी भारतवर्ष की अद्वितीय आध्यात्मिक संपदा से लाभान्वित हो सकती थी? – हाँ बिलकुल !

यद्यपि मदर टेरेसा ने अपना जीवन इस संपन्न आध्यात्मिक परंपरा से युक्त प्राचीन भूमि पर बिताया, लेकिन वह भारतीय अध्यात्म से दूर रही और स्वयं को ही एक एक द्वीप की भांति अलग रखा। आध्यात्मिक जिज्ञासुओं के लिए यह असामान्य नहीं है, कि जब वह दूसरों की सेवा में लीन हो जाते हैं तो, उन्हें यह ध्यान नहीं रहता कि उनके भीतर क्या चल रहा है।

बहुत से कथित धार्मिक लोग वास्तव में आध्यात्मिक मार्ग पर हैं, यह भी संदेहास्पद है। आध्यात्मिक मार्ग पर चलते हुए जिस संघर्ष और वेदना का अनुभव करना पड़ता है, वह उसे न तो पहचानते हैं और न ही स्वीकार करते हैं। मदर टेरेसा स्वयं के प्रति इतनी ईमानदार और इतनी निष्कपट थी कि उन्होंने जो अनुभव किया उसे अभिव्यक्त भी किया। आध्यात्मिक पथ पर सर्वाधिक महत्वपूर्ण यह है कि आप स्वयं के प्रति ईमानदार रहें और यह पहचाने कि आप के भीतर क्या चल रहा है।

दूसरों की सेवा हमारी ऊर्जा को तो बढ़ाती है, परंतु यह हमारे भीतर की पीड़ा को कम नहीं करती। इसके लिए हमें चेतना की प्रक्रियाओं को और सुख दुःख के साथ उनके संबंध को जानना पड़ता है। यह ज्ञान बहुत से भारतीय ग्रंथों जैसे कि उपनिषदों, योगवशिष्ठ, अष्टावक्र गीता और त्रिपुरा-रहस्य में मिलता है।

वेदांत का ज्ञान, मदर टेरेसा को अपने संशयों से उबरने में और अपनी गहन जिज्ञासा को शांत करने में, सहायक हो सकता था। उनके पत्रों में वर्णित सभी अवस्थाओं का उल्लेख महर्षि पतंजलि द्वारा प्रतिपादित योग के नौ अवरोधों में किया गया है। व्याधि, स्त्यान,संशय, प्रमाद, आलस्य, अविरति, भ्रांतिदर्शन, अलब्धभूमिकत्व और अनवस्थितत्व- इन अवरोधों का सामना करने के लिए, बताए गए महर्षि पतंजलि के सिद्धांतों से मदर टेरेसा अत्यंत लाभांवित हो सकती थीं।

मदर टेरेसा, आध्यात्मिक विज्ञान के ज्ञान के बिना, चेतना की इन अवस्थाओं की पीड़ा से गुजरी प्रतीत होती हैं। यह मलेरिया से ग्रसित उस व्यक्ति का समान है, जिसे मलेरिया की दवा के बारे में पता ही नहीं हो।

मदर टेरेसा का अनुभव उस पीड़ा से भिन्न नहीं है, जिससे श्री राम सहित विभिन्न धर्मों के बहुत से संतों और प्रबुद्ध व्यक्तियों को गुजरना पड़ा। श्री राम को उनका मार्गदर्शन महर्षि वशिष्ठ से ‘योग-वशिष्ठ’ के रुप में प्राप्त हुआ। ग्रंथों में यह बताया गया है कि जो व्यक्ति समाधि के अभ्यास में दक्ष हो, केवल वही आध्यात्मिक पीड़ा और संताप से निकलने में दूसरों की सहायता कर सकता है।

जब हमारी परंपरागत धारणाएं हमें उनसे परे परे देखने से रोकती हैं, तो यह हमारी आध्यात्मिक यात्रा में अवरोध बन जाता है।

आध्यात्मिक मार्ग पर चलने वाले व्यक्ति को खुले मन का होना चाहिए और साथ ही परंपराओं का सम्मान भी करना चाहिए। धर्म की सीमाओं से परे आध्यात्मिकता अकेलेपन, एकांत और खालीपन से निपटने में सहायता कर सकती है। इसे अपने स्वयं के धर्म या दर्शन के साथ विश्वासघात के रूप में देखने की आवश्यकता नहीं है।

योग और ध्यान जैसे आध्यात्मिक अभ्यास किसी भी प्रकार से हमारे धार्मिक विश्वास के विरोधी नहीं है। फादर बीड ग्रीफिथ्स का उदाहरण ही लें, जो कि भारत आए और त्रिची में योग और वेदांत दर्शन का अध्ययन किया। इस ज्ञान ने, एक धर्मनिष्ठ ईसाई संत के रूप में, अपनी आस्था पर स्थिर रहते हुए आध्यात्मिक मार्ग में आ रहे अवरोधों से निकलने में उनकी सहायता की।

धर्मनिष्ठ होने के कारण मदर टेरेसा को शायद यही लगा कि यदि वह अपने दुविधा का उत्तर भारतीय अध्यात्म में खोजेंगी, तो यह जीसस (येशु) के साथ विश्वासघात होगा l यदि मार्ग में कोई बाधा आती है तो एक जिज्ञासु को अपने लक्ष्य को सामने रखना होता है और उसे लक्ष्य तक पहुँचने के लिए कोई वैकल्पिक मार्ग खोजना होता है।

जब हम ईश्वर को एक प्रत्यक्ष वस्तु समझते हैं तब हम पूरी तरह से भटक जाते हैं और दुःख पाते हैं। दृश्य से द्रष्टा तक, प्रत्यक्ष से प्रत्यक्षदर्शी तक – चेतना का यह विस्थापन ही आध्यात्मिक यात्रा में बड़ा अंतर ले आता है। इसी से चेतना का स्वभाव जो वास्तविक आनंद है उसका उदय होता है और वेदांत की सिद्धांतों की अनुभूति द्वारा उन सभी रुकावटों, मानसिक अवरोधों और बौद्धिक बाधाओं से पार पाया जा सकता है, जो कि हमारी बुद्धि द्वारा थोपे गए होते हैं।

यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि, लोगों के विचारों में खुलापन नहीं होता, मुझे विश्वास है कि प्राणायाम और ध्यान के कुछ ही सत्र उस आंतरिक वेदना और अंधकार के दिनों से बाहर आने में मदर टेरेसा के लिए सहायक होते। आध्यात्मिक मार्ग पर हजारों जिज्ञासुओं को इस अवस्था की अनुभूति होती है, पर जब वह ध्यान करने लगते हैं तो इस से बाहर निकल आते हैं।

भारतीय दर्शन में तीन प्रकार की पीड़ा के विषय मैं बताया गया है- शारीरिक, मानसिक और आध्यात्मिक। आध्यात्मिक पीड़ा सबसे खराब होती है। व्यक्ति को मानसिक स्तर पर दुख और वेदना की अनुभूति होती है और मन से, विचारों से परे जाना ही ‘समाधि’ का उद्देश्य है। मन बंधन और मुक्ति दोनों का कारक है। जब तक हमें मन को मौन करना नहीं आता, आंतरिक शांति को पाना असंभव है।

मन को योग साधना द्वारा जीता जा सकता है। योग केवल आसन ही नहीं है; प्राणायाम और ध्यान भी उसके अभिन्न अंग हैं। पतंजलि योग दर्शन, आदि शंकर की दृग्दृश्य विवेक, कश्मीर शैवमत की विज्ञान भैरव तंत्र, संत तिरुमूल की तिरुमंदिरम् आदि सब में आध्यात्मिक पीड़ा और दुःख से मुक्ति पाने की विभिन्न विधियां बताई गई हैं।

आयुर्वेद, योग और वेदांत क्रमशः मल, विक्षेप और आवरण को दूर करने के लिए तीन उपाय हैं। जहां आयुर्वेद विचारों को शांत करने में सहायता करता है, प्राणायाम और ध्यान हमें अपने भीतर गहन प्रसन्न होने में सहायता करते हैं।

प्रसन्नता आंतरिक दिव्यता से जुड़ने का प्रतीक मात्र है। वैदान्तिक क्रियाओं द्वारा आप उस अनुपम चेतना की अनुभूति कर सकते हैं, जो आप हैं। यह बस उस को पहचानना है, जो हमारी आत्मा के रुप में हमारे साथ है और सदैव हमारे साथ रहा है।

वेदांत का मूल सिद्धांत यह है कि, आप जो खोज रहे हैं वह आपके आसपास विद्यमान वायु के समान पहले से ही विद्यमान है। आपको उसे खोजने कहीं जाना नहीं है; आपको बस चेतन होने की आवश्यकता है। इसी प्रकार दिव्यता या चेतना, आनंद, प्रेम पहले से ही आप में विद्यमान है। बस इसे पहचानने की आवश्यकता है।

वैज्ञानिक मनोवृत्ति और वैदान्तिक ज्ञान एक साथ मिल कर पूर्णता लाते हैं व आंतरिक स्थिरता प्रदान करते हैं और यही भारतीय अध्यात्म का सार है। आलोचक प्रायः पूछते हैं कि आध्यात्मिकता का क्या लाभ यदि वंचित लोगों का ध्यान न रखा जाए। वह यह नहीं देख पाते कि जहां भी यथार्थ आध्यात्मिकता होती है, वहां सेवा सदैव जुड़ी होती है।

चेतना के क्षेत्र में, जो जैसा बोता है, वैसा फल पाता है। यदि आप सोचते हैं कि पीड़ा ईश्वर से मिलने का एक महत्वपूर्ण साधन है, तो आप पीड़ा को आकर्षित करने के लिए बाध्य हो जाएंगे। यदि आप पीड़ा का बीज बोयेंगे, तो वही फलीभूत होता जाएगा। ध्यान और समाधि की अनुभूति का अभाव जिज्ञासु को निरुत्साही और उदास बना सकता है। इस से बचने के लिए हमें स्वर्ग और नर्क के विषय में और सर्वव्यापक चेतना के विषय में अपनी समझ को बदलने की आवश्यकता है। केवल अध्यात्म ही यह बदलाव ला सकता है।

पूर्वी दर्शन में, अनुभव पहले आता है और फिर विश्वास आता है। पश्चिमी विचारधारा में, विश्वास पहले आता है और फिर अनुभव आता है। मदर टेरेसा में विश्वास था, परंतु अनुभूति के लिए तड़प रहीं थी और वह अनुभूति ही थी, जिसने नास्तिक विवेकानंद को स्वामी बना दिया था। यह विडंबना ही है कि कोलकाता एक ही शताब्दी में दोनों का साक्षी बना।

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