भूतकाल का अवलोकन और भविष्य पर दृष्टि | Looking back, looking ahead

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उत्सव मनाने के लिए कोई भी कारण हो अच्छा होता है, क्योंकि उत्सव मनाना हमारी आत्मा का स्वभाव है। नये वर्ष का आरम्भ ,वह समय है, जब उत्सव मनाने का उत्साह पूरे विश्व पर छा जाता है। इसी के साथ यह एक सुनहरा अवसर है, बीते साल का अवलोकन कर उस से हमने क्या सीखा, यह जानने का। जीवन में कुछ सीखने योग्य है, तो कुछ भुलाने योग्य – सीखना इसीलिए कि हम पुनः वही गलतियां नहीं दोहरायें और भुलाना इसलिए कि उनसे हुए  मानसिक आघात से हम बच जायें।

इस वर्ष का आरम्भ निर्भया कांड जैसी बड़ी ही दुःखद घटना के साथ हुआ। देश में समस्त वातावरण अविश्वास और क्रोध से भरा हुआ था। यद्यपि इस वर्ष में भी प्राकृतिक और मानव निर्मित आपदाओं का अपना हिस्सा था, तथापि बहुत सी सकारात्मक घटनायें भी हुई। काफी लोगों को लगा कि दो साल पहले भ्रष्टाचार के विरुद्ध उठी लहर कहीं खो गयी है, लेकिन यह लहर निरंतर बनी रही और एक बेहतर भारत के निर्माण के लिए एक वास्तविक सामूहिक संकल्प बन गयी है। इसका सारा श्रेय हमारे देश की युवाशक्ति को जाता है। लोकपाल विधेयक को पारित किया गया; यद्यपि यह परिपूर्ण नही है, तथापि सही दिशा की ओर यह पहला कदम है। पिछले महीने राज्य विधानसभा चुनाव में हुआ उच्च मतदान एक बहुत ही उत्साहवर्धक संकेत है और यह दर्शाता है कि हम एक राष्ट्र के रूप में जाग गए हैं। इसी समय और भी बहुत कुछ करने की आवश्यकता है। हमारे हाथ में सबसे तत्कालीन कार्य यह सुनिश्चित करना है कि हमारे आसपास हर किसी ने २०१४ में हो रहे आम चुनाव मतदान के लिए पंजीकृत कर लिया है।

“मैं भविष्य को किस तरह से देखता हूँ” यह प्रश्न लोग मुझ से बहुत बार पूछते है और मैं कहता हूँ कि भविष्य उन्हें जैसा चाहिए वैसा बनाना उनके अपने ऊपर निर्भर है। मूर्ख बीती बातों पर पश्चाताप करते रहते हैं, भविष्य को अपना प्रारब्ध मान कर वर्तमान में दुःखी रहते हैं। बुद्धिमान भूतकाल को प्रारब्ध समझ कर, भविष्य को अपनी स्वतंत्र इच्छा के रूप में देखते हैं और वर्तमान में प्रसन्न रहते हैं।

पिछले एक वर्ष की घटनाएं, उस समय कितनी भी महत्वपूर्ण होंगी, लेकिन अब पुनरावलोकन करते हुए हम उन्हें केवल एक स्वपन की तरह ही देख सकते हैं। इन घटनाओं पर प्रकाश डाला जाए तो, सभी चीजों का नश्वर स्वभाव समझ में आता है। बेरोकटोक बहने वाली  समय रूपी महान नदी की धारा में घटनायें छोटे-छोटे कंकड़ और पत्थर की तरह हैं।

वैसे ही जैसे हम घटनाओं और परिस्थितियों के बाह्य जगत में रहते हैं, उसी तरह हम अपनी भावनाओं और भावावेश की अंतर्जगत में भी निवास करते हैं और हम इसके प्रति हमेशा सजग नहीं रहते। ध्यान एक ऐसा सर्वोत्कृष्ट साधन है, जो हमारे ऊपर हावी भूतकाल के प्रभाव को मन से साफ कर देता है। बाहरी और भीतरी जगत के बीच मात्र पलक झपकने जितनी दूरी है।

योग अपने भीतर के जगत के प्रति सजग रहते हुए, बाहरी जगत में उत्साह से व्यवहार करने का कौशल है। जब हम बाहर के जगत में खो जाते हैं, तब अंतर्जगत में विसंगति आ जाती है और जीवन एक युद्ध की तरह भासित होता है। जब हम भीतर के जगत में स्थापित रहते हैं, तो बाहरी जगत के प्रति स्पष्टता आती है और जीवन एक खेल बन जाता है।

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