९/११: एक दशक पश्चात

९/११: एक दशक पश्चात
Time: 
09/09/2011

हालांकि ९/११ से पहले भी कई आतंकी गतिविधियां हुई थीं, पर ९/११ की इस घटना ने विश्व के जन-समुदाय को एक साथ लाकर आतंकवाद के खिलाफ़ कदम उठाने पर मजबूर कर दिया।

 

आइये देखें कि इस से हमें क्या मिला? इस से सुरक्षा गतिविधियों पर कई बिलियन डॉलरों का खर्च हो गया। इस से दो युद्ध जन्में, जिस से कि अमरीका में आर्थिक संकट पैदा हो गया। इस से सुरक्षा के कई कड़े नियम उपजे, जैसे कि उड़ान में बैठने से पहले जूते उतारना, उड़ान में तरल पदार्थ साथ ले जाने पर रोक, और किसी भी व्यक्ति के बारे में अकारण जांच-पड़ताल...।

 

दस साल तक इस तरह का जीवन जीने के बाद, अब हमें आंकलन करना चाहिये कि आतंक के खिलाफ़ यह युद्ध कितना कारगर सिद्ध हुआ है? हां अब हमारी सुरक्षा व्यवस्था ज़रूर सुदृढ़ हो गई है। फिर भी हमें देखना होगा, क्या आतंकवाद से निबटने के लिये इतना काफ़ी है? नहीं! उसके लिये शिक्षा में परिवर्तन की आवश्यकता है।

 

आतंकवाद का मूल कारण क्या है? धार्मिक कट्टरता और ईश्वर के नाम पर अन्य संस्कृतियों के प्रति नफ़रत के कारण हिंसा के रास्ते पर चलना और उसे सही करार देना। इस पूरी दुनिया में बहुत ही कम लोग ऐसा सोचते हैं कि, ‘केवल मेरा धर्म ही स्वर्ग का रास्ता है।’ उन्हें ऐसा लगता है कि, पूरी दुनिया के लोगों को उनके ही नियमों का पालन करना चाहिये, और जो ऐसा नहीं करते वे नर्क में जायेंगे।

 

धर्म की ग़लत समझ के कारण विश्व में आतंकवाद है। स्कूलों और कालेजों में आतंकवाद को पुष्ट किया जा रहा है। चाहे वह वामपंथ हो या धार्मिक आतंकवाद, इन सभी की जड़ें स्कूलों और कालेजों में हैं। ऐसे में, इलाज भी यही है कि शिक्षा को बहु-सांस्कृतिक और बहु-धार्मिक बनाया जाये। विश्व की सांस्कृतिक विविधता के प्रति सम्मान का भाव बच्चों में शुरु से ही पुष्ट करना होगा। यदि एक बच्चा, अपनी कक्षा में, साथ पढ़ रहे ३०-४० बच्चों से मित्रता नहीं रख सकता तो वयस्क होने पर वह दुनिया में उन हज़ारों लोगों के साथ जो कि विभिन्न परिवेश से आते हैं, मित्रता का भाव कैसे रख पायेगा?

 

यदि एक बच्चा अपने शुरुवाती जीवन में ही सभी धर्मों के बारे में कुछ सीखे तो सभी धर्मों के बारे में उसकी जानकारी होने के कारण वह उनका सम्मान करेगा। वह किसी भी धर्म से नफ़रत नहीं करेगा। एक विस्तृत दृष्टिकोण और सबको अपना समझने के कारण, आतंकवाद का बीज मन में पनप नहीं पायेगा।

 

वैसे भी हम दुनिया के अलग अलग भागों से कितनी सारी चीज़ें स्वीकार करते ही हैं! डेन्मार्क की स्वादिष्ठ डेनिश कुकीस खाने के लिये हमारा डेनिश होना आवश्यक नहीं है। स्विस चाकलेट खाने से हम स्विस नहीं हो जाते। चाइनीज़ व्यंजन खाने से हम चायनीज़ नहीं बन जाते हैं। हम जगह जगह के संगीत को भी स्वीकार करते हैं। ठीक इसी तरह, हमें ज्ञान का भी वैश्वीकरण करना चाहिये। हमें अपने दृष्टिकोण को व्यापक बनाना है। हर बच्चे को सभी धार्मिक पुस्तकों के बारे में थोड़ा ज्ञान होना चाहिये – उपनिषद, बाइबल, क़ुरान, गुरु ग्रन्थ-साहिब, एवं अन्य धार्मिक ग्रन्थ। बहु-सांस्कृतिक एवं बहु-धार्मिक शिक्षा एवं अनुभव से प्रेम और सद्भाव का बहुत प्रचलन होगा।

 

आतंकवाद से हम सभी का जीवन प्रभावित होता है, और यह हमारा कर्तव्य है कि हम ऐसे भविष्य के लिये निवेश करें जिसमें आतंकवाद की कोई जगह ना हो। यह हम सभी को करना है। यदि, इस पूरे विश्व में कुछ लोग भी संकीर्ण दृष्टि या धार्मिक कट्टरता के साथ जीते रहे तो यह विश्व एक सुरक्षित स्थान नहीं हो सकता। यह आवश्यक है कि शिक्षा में मानवीय गुणों और बहुसांस्कृतिक परिवेश का समन्वय हो। कदाचित, आतंकवाद से छुटकारा पाने के लिये यह एक कारगर विधि होगी।

 

पूरा लेख पढ़ें - द हफ़िंगटन पोस्ट.