विश्व शांति की ओर
सन २०११ में विश्व में अभूतपूर्व संख्या में सामाजिक क्रांतियाँ, सैन्य संघर्ष और प्राकृतिक आपदायें आई हैं। इन सब के साथ साथ आर्थिक मंदी के रहते दुनिया की चुनौतियाँ पहले से कहीं ज्यादा जटिल दिखाई देती हैं। हालाँकि गुज़रे समय के मुकाबले आजकल हम सब एक दूसरे से ज्यादा जुड़े हुए हैं। यूरोप में चल रहा ऋण संकट दर्शाता है कि कैसे एक देश की अर्थव्यवस्था पूरी दुनिया पर प्रभाव डाल सकती है। जलवायु परिवर्तन, बढ़ती खाद्य कमी और पानी की कमी, दलों के बीच मतभेद जैसे मुद्दों को एक सामूहिक प्रतिक्रिया की आवश्यकता है - इन समस्याओं से निपटने के लिए पूरी दुनिया को एकजुट होने की जरूरत है।
इन चुनौतीपूर्ण मुद्दों के समाधान के लिए एक व्यापक दृष्टि और एक शांत मन की ज़रुरत है।
अनुरूपता हासिल करने के लिए इंसान को अपने अंदर और बाहर चल रहे प्रतिद्वन्द को कारगर रूप से निपटने में सक्षम होने की ज़रुरत है। आपने देखा होगा कि आपकी भावनाओं का आपकी सांस के ऊपर एक निश्चित प्रभाव होता है। जब आप गुस्से में होते हैं, आपकी सांस तेज़ हो जाती है, जब आप आराम कर रहे होते हैं अथवा शांत होते हैं तब आपकी सांस लम्बी और गहरी हो जाती हैं। जैसे आपका मन आपकी सांसों पर प्रभाव डालता है उसी तरह आप अपनी सांस के माध्यम से अपने मन को प्रभावित कर सकते हैं। सांस को साध के इंसान एक शांत और स्पष्ट मन प्राप्त कर सकता है। जब आपका मन शांत होता है तब आप स्थितियों को अधिक स्पष्टता से देख सकते हैं और एक बेहतर निर्णय ले सकते हैं।
बातचीत में सुधार
जब एक व्यक्ति के मन में मतभेद उठता हैं तब उसकी धारणा, अवलोकन और अभिव्यक्ति प्रभावित हो जाती हैं। इस कारण दूसरे लोगों के साथ उसका बातचीत का ढंग भी प्रभावित हो जाता है। दो गुटों के बीच अनबन हो तो सबसे पहले उन दोनों के बीच बोलचाल को बहाल करना और सुधारना चाहिये। यह तभी हो सकता है जब आपका मन शांत हो और अभिक्रिया करने के बजाय प्रतिक्रिया करे। मन को शांत करने के लिए मानसिक दुखों से मुक्त होने की ज़रुरत है।
आर्ट आफ़ लिविंग के स्वयं सेवकों द्वारा उपयोग की गई लयबद्ध सांस लेने की तकनीक और ध्यान की वजह से संवेदनशील क्षेत्रों में मानसिक आघात से मुक्ति पाने में काफी सहायता मिली है।
एक अन्य महत्वपूर्ण बात जो बातचीत के माध्यम से सुधारी जा सकती हैं वह हैं इंसान का दृष्टिकोण। बेहतर बातचीत से इंसान यह समझने में सक्षम हो जाता है की हर अपराधी के भीतर एक पीड़ित व्यक्ति हैं जो मदद के लिए रो रहा है। जब पीड़ित व्यक्ति की गुहार सुन ली जाती है तब उसके अंदर का अपराधी ग़ायब हो जाता है। हमें लोगों को मानसिक दुखों से बाहर निकलने में और विरोधी दलों के बीच में विश्वास बनाने में मदद करनी चाहिए। जब एक ऐसा इंसान जिसका मन संतुलित हैं, जो बुद्धिमान है और जिसका जीवन के प्रति समग्र दृष्टिकोण है वह किसी लड़ाई में हस्तक्षेप करता है तब समस्या का हल निकल सकता है, चाहे यह दलों के बीच में वैचारिक अंतर हो या समूहों में राजनीति से प्रेरित खेल हो, बातचीत के माध्यम से हमेशा सुधार की गुंजाईश रहती है।
आर्ट आफ़ लिविंग कोटे डी आइवर, कोसोवो, जम्मू और कश्मीर, बिहार, इराक और श्रीलंका में समुदायों के बीच विश्वास बनाने में कार्यरत है। आर्ट आफ़ लिविंग ने इराकी सरकार द्वारा चुने गए ५० युवा नेताओं को शांतिदूत बनने के लिए प्रशिक्षित किया। इराकी महिलायें भी इस प्रशिक्षण में भागीदार रहीं।
भारत आजकल जिन चुनौतियों का सामना कर रहा है उसमें एक बहुत बड़ी चुनौती है माओवादी हिंसा (लाल आतंक)। आर्ट आफ़ लिविंग ने बड़े पैमाने पर भारत के नक्सलवाद-प्रभावित क्षेत्रों में काम किया है। हमारे स्वयंसेवकों ने झारखंड (भारत में जो माओवाद का गढ़ है) में पटमदा नामक गांव में एक आश्रय केंद्र स्थापित किया है।
शिक्षा में परिवर्तन
आतंकवाद की जड़ें धार्मिक मतारोपण, गरीबी या जातीय पहचान में हैं। आतंकवादी, भगवान के नाम पर अन्य संस्कृतियों के लिए घृणा पैदा करते हैं। गरीबी को खत्म करने और शिक्षा लाने के प्रयास में, आर्ट ऑफ़ लिविंग ने आर्थिक रूप से पिछड़े क्षेत्रों पर विशेष ध्यान देते हुए भारत भर में १८५ स्कूल शुरू किये हैं। हजारों बच्चे वहां अहिंसा के सिद्धांतों पर आधारित मुफ्त शिक्षा पा रहे हैं।
दुनिया में कुछ छोटे से वर्ग के लोगों की यह मानसिकता है कि उनके ही सिद्धांत और धार्मिक मान्यतायें सारी दुनिया को माननी चाहिए। ऐसी संकीर्ण मानसिकता का मुकाबला करने के लिए हमें शिक्षा को बहु-सांस्कृतिक और बहु-धार्मिक बनाना होगा। लोगों में दुनिया की विविधता के प्रति निष्कपट स्वीकृति हो, ऐसा संस्कार हमें बहुत छोटी उम्र में ही उन्हें देनी होगी।
आध्यात्मिकता की मदद से हमारी दृष्टि व्यापक बन सकती है और हमारी स्वीकृति में सुधार आ सकता है। जीवन में जब आध्यात्मिक पहलू पर ध्यान दिया जाता है, तो ज़िम्मेदारी और अपनेपन की भावना अपने आप आ जाती है। आत्मा जीवन को संभाले रखती है। यह हमें मजबूत और ठोस बनाती है। यह जाति, पंथ, धर्म और राष्ट्रीयता की संकीर्ण सीमाओं को तोड़ देती है और हमें जागरूक बनाती है। इस चेतना के उत्थान से लड़ाइयों को खत्म किया जा सकता है और मानवता को बहाल किया जा सकता है।
जब भी अलगाव होता है, जब भी हम किसी व्यक्ति को अन्य या दुश्मन के रूप में देखते हैं, हिंसा की संभावना बढ़ जाती है। जहाँ पर भी सम्बन्ध होता हैं वहां प्रेम, करुणा और दया अपने आप आ जाती है। यह संभव नहीं हैं की हम एक इंसान के अंदर मानवता को देखें और फिर उसके साथ हिंसक कृत्य करें।
आज विश्व शांति दिवस के अवसर पर, मैं दुनिया के सब देशों से आग्रह करता हूँ कि साथ मिलकर आगे आए और अपने रक्षा-बजट का थोड़ा सा अंश शांति की शिक्षा के लिए निकालें। केवल शिक्षा के माध्यम से ही हम ऐसा माहौल बना सकते हैं जहाँ सब लोग घृणा मुक्त हो कर प्रेम, समझदारी और करुणा से आगे आकर और मिलकर रह सकते हैं।
मैं हिंसा और तनाव से मुक्त एक दुनिया की कल्पना करता हूँ, और एक शांतिपूर्ण और तनाव मुक्त विश्व बनाने में हम प्रयास कर रहे हैं। मैं अधिक से अधिक लोगों से आग्रह करता हूँ कि वे आगे आए और दुनिया के हर कोने में शांति लाने में एक सक्रिय भूमिका अदा करें। जब तक वैश्विक परिवार का हर सदस्य शांतिपूर्ण नहीं हो जाता, हमारी शांति अधूरी है।
हमें शांति की तीन स्तरों पर ज़रुरत है। पहली है मन की शांति - यह हम सब के मन में होनी चाहिए जिससे हमारी कार्यक्षमता में तेज़ी आयेंगी और हमारे विचार पहले से ज्यादा शक्तिशाली बनेंगे। दूसरी है हमारे परिवेश, हमारे परिवार, दोस्तों और कार्य-स्थलों में शांति। तीसरी हैं देशों और महाद्वीपों में शांति, जो कि सबसे महत्वपूर्ण है।
अब समय आ गया हैं जब हम संस्कृतियों के बीच की दीवारों को तोड़ दे और विविधता का जश्न मनायें। अब समय आ गया है कि हम युवकों को और बच्चों को सीमित पहचान से परे देखने के लिए और मानवता से संबद्ध होने के लिए प्रोत्साहित करें। इस तरह हम एक हिंसा-मुक्त और तनाव-विहीन समाज बना सकते हैं।
पूरा लेख हफ़िंगटन पोस्ट में पढ़िये।